Thursday, 5 November 2015

हल्की-हल्की हवायें,
हल्की ठंठी सुबह।
खिडकियों से झांकता सूरज।
"उठो ना !"
और बस तुम..।

छम-छम, छम-छम,
इधर से उधर। 
भींगे बालों से 
गिरती  ,
ओस की बुँदे।
चाय का कप।
"पेपर छोडो।"
और बस तुम..।

चेहरे पे लटकते कुछ केश।
बेलन के साथ-साथ
बजती चूड़ी।
कमर में फँसा
साड़ी का पल्लू।
"छोडो जल जाएगी। "
और बस तुम.... । 

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