Saturday, 6 February 2016

डरता हूँ मैं सच्चाई से,

हाँ, डरता हूँ मैं उजालो से

रहने दो मुझे झूठ के अंधेरो में। 

'सच' इतना खौफनाक है ,

'उजाले' इतने डरावने है।

रिस्तो को तोड़ते 'सच' तो कहीं

अपनो से दूर करते 'उजाले'

रहने दो मुझे झूठ के अंधेरो मे।

या समझो इसे 'सपनो की दुनिया'

सपने भी तो रात के अंधेरो मे आते है

सपने भी तो झूठे होते है।

रहने दो मुझे सपनो को दुनिया मे।

तू गया ही कब था जो मुझे रुलाएगा

याद आ-आ के मुझे सताएगा

रखा है तुझे बाँध के सपनो की दुनिया मे

न जाने दूँगा कभी, सोने दे कुछ देर और मुझे।

रुको ! कुछ देर और 
तो चले जाना।

अय शाम बैठो,
कुछ पल और सुहाना कर दो 
तो चले जाना।

बचपन अभी खेल ही रहे है,
अय सूरज अपनी किरणों से कह दो
थोड़ा हँस ले
तो चले जाना।

अय साँझ के उजाले रुको
अभी 'वो'  मुस्कुराये है
ना करो इतनी जल्दी
तो चले जाना।

ए..! एक बार इधर देखो
ना शरमाओ
तुम्हे भी इश्क़ हो गया है
तो चले जाना।

रुको! कुछ देर और
तो चले जाना।  
जीवित है स्पर्श मेरे शरीर मे,
उन अंधेरो को समर्पित । 
जीवित है गंध ओढनी मे समेटे 
कुछ अहसासो को लिए ।
जीवित है भरोसा कंधों का
सर रख के भूल जाती हूँ
खुद को कुछ देर के लिए ।
उन खामोसियों को समर्पित ।
सुनो ! रूठी तो मनाओगे ना..।
चीज़े नही बिकती यहाँ
"मज़बूरी" बिकती है साहब।
दाम सामान का नहीं लगता
"बेबसी" का लगता है साहब।
बेटे की पढाई हो,
चाहे बेटी की शादी,
माँ बीमार हो,
चाहे बाप बेकाम हो,
पेट से लेकर खेत तक
घर से लेकर बाजार तक
कही पीछा नही छोड़ती।
हर बार बिकती है मज़बूरी,
बेबसी और लाचारी साहब
हर बार।