असर इस कदर है तेरी यादों का
जेठ में भी नमी देर तलक रहती है।
एक चाँद ही तो था आसमाँ के वजूद के लिए
अमावस तेरे कारण बेसुध फ़लक रहता है।
अनमोल सोने जैसी हँसी तेरी
अब ये सोना बनिए के दुकानों में रहता है।
दुनिया भर के झूठे रिश्ते, बस एक इश्क़ सच्चा
अब ये सच अदालत के कटघरे में रहता है।
Friday, 13 November 2015
खिड़कियाँ वही है
परदे वही है
परदे के पीछे वो सूरत नही है ...
मकां वही है
गलियाँ वही है
गलियों में वो पहले जैसी रौनक नही है ...
शामे वही है
बारिशे वही है
बारिशों में जुल्फों का भींगना नही है ...
दिन भी वही है
रातें वही है
रातों में पल -पल तडपना नही है ...
धडकने वही है
सासें वही है
सासों में सासों का घुलना नही है ...!!
गलियों में वो पहले जैसी रौनक नही है ...
शामे वही है
बारिशे वही है
बारिशों में जुल्फों का भींगना नही है ...
दिन भी वही है
रातें वही है
रातों में पल -पल तडपना नही है ...
धडकने वही है
सासें वही है
सासों में सासों का घुलना नही है ...!!
Saturday, 7 November 2015
खाली-खाली-सा आसमान अधूरा
अधूरे चाँद का होना
याद है लेकिन ।
हाँ ! मैं चुप-चुप-सा बूत बना
तेरा बेबाक बोलना
याद है लेकिन ।
दुनिया की बड़ी-बड़ी बातों का गम नही
तेरी छोटी-छोटी बातों से फर्क पड़ना
याद है लेकिन ।
मेरी बेबसी तुम्हे सुन मुस्कुराना
तुम्हारी जिद्द की मिलने आ जाना
याद है लेकिन ।
सोचता रहा पुरे रास्ते तुमको
बेचैनी में तेरा भी राह तकना
याद है लेकिन ।
मैं, तुम, हल्की शाम तक तो ठीक था
खुले केशों का यूँ बारीश में भींगना
याद है लेकिन ।
अभी सोचा ही था मैं मुझसे मिल जाऊ बढ़ कर
तेरा बढ़ के आगे मुझसे लिपटना
याद है लेकिन ।
हर रोज कोशिश कर रहा हूँ सब भूल ही जाऊ
लबों से उन लबों का उस शाम मिलना
याद है लेकिन ।
याद है लेकिन ।
दुनिया की बड़ी-बड़ी बातों का गम नही
तेरी छोटी-छोटी बातों से फर्क पड़ना
याद है लेकिन ।
मेरी बेबसी तुम्हे सुन मुस्कुराना
तुम्हारी जिद्द की मिलने आ जाना
याद है लेकिन ।
सोचता रहा पुरे रास्ते तुमको
बेचैनी में तेरा भी राह तकना
याद है लेकिन ।
मैं, तुम, हल्की शाम तक तो ठीक था
खुले केशों का यूँ बारीश में भींगना
याद है लेकिन ।
अभी सोचा ही था मैं मुझसे मिल जाऊ बढ़ कर
तेरा बढ़ के आगे मुझसे लिपटना
याद है लेकिन ।
हर रोज कोशिश कर रहा हूँ सब भूल ही जाऊ
लबों से उन लबों का उस शाम मिलना
याद है लेकिन ।
Thursday, 5 November 2015
कुछ सोच कर 'वो' आज भी हैरान है,
मुझे भूलने की कोशिश मे 'वो नादान' है।
उसने कब का कहा था- दिल से चले गये तुम,
अरे जा ! आज तक तेरे दिल मे मेरी मौजूदगी के निशान है।
बड़ी सफाई से वो झूठ बोलने की आदी हो गयीं है,
दंग रह जाता हूँ देख के, सिसकती आखों को लपेटे मुस्कान है।
जितने करीब थे, कि मस्वीरा साँसों से साँसे करती थी,
अक्स की भी पहचान न हो, अब इतने फ़ासले दरम्यान है।
दंग रह जाता हूँ देख के, सिसकती आखों को लपेटे मुस्कान है।
जितने करीब थे, कि मस्वीरा साँसों से साँसे करती थी,
अक्स की भी पहचान न हो, अब इतने फ़ासले दरम्यान है।
लफ़ज़ो मे लिपटे सारे,
ज़ज्बात है तुम्हारे
ये और बात है कि,
ये बात है तुम्हारे ।
जो भी मिले है हम से,
वजह पूछता है खुशी के
कैसे कहूँ किसी से,
ये जो राज़ है हमारे ।
पहचान खो के अपनी,
तू जो दुनिया से लड़ता है
समझता हूँ खूब मैं भी,
क्यूँ ये हाल है तुम्हारे।
बोझ-सी लगे है,
ज़िंदगी भी अब तो
क्या खूब थे वो दिन भी,
वो जो साथ थे हमारे ।
तू जो गयी है जब से,
सब कुछ ख़तम हो जैसे
रो-रो अब कटे है,
दिन-रात भी हमारे ।
वो रोये जा रहे थे ,
मुझ से लिपट के उस दिन
सर रख दिया था कन्धों पे,
था हाथों में हाथ हमारे ।
पल-पल को जो जीया था
यूँ साथ में तुम्हारे
मर-मर के जी रहे है
हर पल बिन तुम्हारे।
लफ़ज़ो मे लिपटे सारे,
ज़ज्बात है तुम्हारे
ये और बात है कि,
ये बात है तुम्हारे ।
ज़ज्बात है तुम्हारे
ये और बात है कि,
ये बात है तुम्हारे ।
जो भी मिले है हम से,
वजह पूछता है खुशी के
कैसे कहूँ किसी से,
ये जो राज़ है हमारे ।
पहचान खो के अपनी,
तू जो दुनिया से लड़ता है
समझता हूँ खूब मैं भी,
क्यूँ ये हाल है तुम्हारे।
बोझ-सी लगे है,
ज़िंदगी भी अब तो
क्या खूब थे वो दिन भी,
वो जो साथ थे हमारे ।
तू जो गयी है जब से,
सब कुछ ख़तम हो जैसे
रो-रो अब कटे है,
दिन-रात भी हमारे ।
वो रोये जा रहे थे ,
मुझ से लिपट के उस दिन
सर रख दिया था कन्धों पे,
था हाथों में हाथ हमारे ।
पल-पल को जो जीया था
यूँ साथ में तुम्हारे
मर-मर के जी रहे है
हर पल बिन तुम्हारे।
लफ़ज़ो मे लिपटे सारे,
ज़ज्बात है तुम्हारे
ये और बात है कि,
ये बात है तुम्हारे ।
रात बीती वो सारी देखते- देखते
शरमाई वो आखें, देखते देख के
बात सासों की सासों से होती रही रात भर
धडकनों का धड़कना, धडकनों ने सुना
'दूध में घुली सिंदूर' सा बदन
मुझ पे छाया रहा यूँ ही रात भर
सैकड़ों लहरे, तरंगे, ज्वारभाट्टे लिए
जैसे सागर में सरिता समाती रही
तारे, नक्षत्र, धूमकेतु सभी
एक परम-तत्व के जैसे भागी बने
मुझसे मुझको मिलाया, खुद से खुद भी मिली
सारी बातें हुई, होठ भी न हिले
भोर की भी दस्तक हुई देखते-देखते
होठ मुस्काये मगर देखते देख के ...!!
मुझ पे छाया रहा यूँ ही रात भर
सैकड़ों लहरे, तरंगे, ज्वारभाट्टे लिए
जैसे सागर में सरिता समाती रही
तारे, नक्षत्र, धूमकेतु सभी
एक परम-तत्व के जैसे भागी बने
मुझसे मुझको मिलाया, खुद से खुद भी मिली
सारी बातें हुई, होठ भी न हिले
भोर की भी दस्तक हुई देखते-देखते
होठ मुस्काये मगर देखते देख के ...!!
सोये होंगे सब चद्दर तान
सबसे पहले वो जागी होगी।
बिस्तर सजा, चूल्हे पे चाय चढ़ाई होगी।
घर, आँगन की साफ-सफाई को
झाड़ू फिर उठाई होगी।
खाना बना, सबको खिला
जल्दी से कॉलेज आई होगी।
अपने हिस्से के हल्वे से भी
भाई के लिए छुपाई होगी।
पापा के ऑफिस से आने पर
'जी ...! पापा' कह दौड़ लगाई होगी।
देर रात सबको खिला
माँ के पैर दबाई होगी।
कर ख़तम सारे काम, मगर
आखिर में सबसे खाई होगी।
सोने से पहले, खुद ही अपने पैर दबाई होगी।
बैठ अकेले तन्हाई में
मन -ही -मन मुस्काई होगी ।।
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