Wednesday, 11 January 2017

ये चीथड़े बेबसी के उठता हूँ
हाँ हाँ मैं कचरे उठता हूँ।
अधेड़ हो चुकी है आज़ादी लेकिन
भूख बेताल है कंधे पर बिठाता हूँ ।
मुल्क ऊंघ रहा है 'वाद' की गोद में
जगाता हूँ, मैं ही जाग जाता हूँ।
गरीबी धुप है, सर जलते पाँव जलते है
मरहम बस रोटी है ये मैं बताता हूँ ।
बच्चे सो गए खा के, ये बीवी बताती है
कहानी सुना के सुलाई है ये बेटी बताती है।
न सड़ती है न जलती है युगों तक चलती है
ये पन्नी मुफलिसी है पीढ़ियों चलती है ।