Wednesday, 11 January 2017

ये चीथड़े बेबसी के उठता हूँ
हाँ हाँ मैं कचरे उठता हूँ।
अधेड़ हो चुकी है आज़ादी लेकिन
भूख बेताल है कंधे पर बिठाता हूँ ।
मुल्क ऊंघ रहा है 'वाद' की गोद में
जगाता हूँ, मैं ही जाग जाता हूँ।
गरीबी धुप है, सर जलते पाँव जलते है
मरहम बस रोटी है ये मैं बताता हूँ ।
बच्चे सो गए खा के, ये बीवी बताती है
कहानी सुना के सुलाई है ये बेटी बताती है।
न सड़ती है न जलती है युगों तक चलती है
ये पन्नी मुफलिसी है पीढ़ियों चलती है ।

Saturday, 6 February 2016

डरता हूँ मैं सच्चाई से,

हाँ, डरता हूँ मैं उजालो से

रहने दो मुझे झूठ के अंधेरो में। 

'सच' इतना खौफनाक है ,

'उजाले' इतने डरावने है।

रिस्तो को तोड़ते 'सच' तो कहीं

अपनो से दूर करते 'उजाले'

रहने दो मुझे झूठ के अंधेरो मे।

या समझो इसे 'सपनो की दुनिया'

सपने भी तो रात के अंधेरो मे आते है

सपने भी तो झूठे होते है।

रहने दो मुझे सपनो को दुनिया मे।

तू गया ही कब था जो मुझे रुलाएगा

याद आ-आ के मुझे सताएगा

रखा है तुझे बाँध के सपनो की दुनिया मे

न जाने दूँगा कभी, सोने दे कुछ देर और मुझे।

रुको ! कुछ देर और 
तो चले जाना।

अय शाम बैठो,
कुछ पल और सुहाना कर दो 
तो चले जाना।

बचपन अभी खेल ही रहे है,
अय सूरज अपनी किरणों से कह दो
थोड़ा हँस ले
तो चले जाना।

अय साँझ के उजाले रुको
अभी 'वो'  मुस्कुराये है
ना करो इतनी जल्दी
तो चले जाना।

ए..! एक बार इधर देखो
ना शरमाओ
तुम्हे भी इश्क़ हो गया है
तो चले जाना।

रुको! कुछ देर और
तो चले जाना।  
जीवित है स्पर्श मेरे शरीर मे,
उन अंधेरो को समर्पित । 
जीवित है गंध ओढनी मे समेटे 
कुछ अहसासो को लिए ।
जीवित है भरोसा कंधों का
सर रख के भूल जाती हूँ
खुद को कुछ देर के लिए ।
उन खामोसियों को समर्पित ।
सुनो ! रूठी तो मनाओगे ना..।
चीज़े नही बिकती यहाँ
"मज़बूरी" बिकती है साहब।
दाम सामान का नहीं लगता
"बेबसी" का लगता है साहब।
बेटे की पढाई हो,
चाहे बेटी की शादी,
माँ बीमार हो,
चाहे बाप बेकाम हो,
पेट से लेकर खेत तक
घर से लेकर बाजार तक
कही पीछा नही छोड़ती।
हर बार बिकती है मज़बूरी,
बेबसी और लाचारी साहब
हर बार।

Tuesday, 1 December 2015

इस शहर के शोर,
अनसुलझे सवालों,
पेचीदा रिश्तों के जिम्मेवारियों।
जहाँ खुद को भूला के
दूसरों के लिये जीते चले गए।
जिस भवँर में ना डूबते बना
ना तैर के पर करते।
न गलत को गलत कह सके
न सही को सही।
पहेली सुलझाते गए
खुद उलझते गए।
जब आँखों से सांचे में
आसूं मोम सा पिघला दिया।
आओ चले इस इन सब से दूर
उस भोर की लाली के पीछे
हरे घास के ओस पर
नंगे पाँव चले
कुछ देर अपने आप से बातें करे।
दोपहरी में चलते चलते
थक के नीम के पेड़ ने नीचे
कोयल की आवाज सुन सो जाये।
शाम को लॉन में लेट
देर तक 'उसकी' दुपट्टे से नीले
आकाश को देखे।
रात को फूटपाथ पर खोमोश
चलते जाए
जैसे उसका हाथ थामे
जा रहे है चाँद के नीले
रौशनी तले जन्मों से
गूंगे अहसासों को आवाज देने।
आओ वही चलते है।

Friday, 13 November 2015

असर इस कदर है तेरी यादों का जेठ में भी नमी देर तलक रहती है। एक चाँद ही तो था आसमाँ के वजूद के लिए अमावस तेरे कारण बेसुध फ़लक रहता है। अनमोल सोने जैसी हँसी तेरी अब ये सोना बनिए के दुकानों में रहता है। दुनिया भर के झूठे रिश्ते, बस एक इश्क़ सच्चा अब ये सच अदालत के कटघरे में रहता है।