चीज़े नही बिकती यहाँ
"मज़बूरी" बिकती है साहब।
दाम सामान का नहीं लगता
"बेबसी" का लगता है साहब।
बेटे की पढाई हो,
चाहे बेटी की शादी,
माँ बीमार हो,
चाहे बाप बेकाम हो,
पेट से लेकर खेत तक
घर से लेकर बाजार तक
कही पीछा नही छोड़ती।
हर बार बिकती है मज़बूरी,
बेबसी और लाचारी साहब
हर बार।
"मज़बूरी" बिकती है साहब।
दाम सामान का नहीं लगता
"बेबसी" का लगता है साहब।
बेटे की पढाई हो,
चाहे बेटी की शादी,
माँ बीमार हो,
चाहे बाप बेकाम हो,
पेट से लेकर खेत तक
घर से लेकर बाजार तक
कही पीछा नही छोड़ती।
हर बार बिकती है मज़बूरी,
बेबसी और लाचारी साहब
हर बार।
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